लगता है टैम वाले दिवाली की छुट्टी पर जा चुके हैं। इसलिए उन्होंने टीआरपी में ज्यादा दिमाग लगाने की बजाय पिछले हफ्ते जैसा ही सब कुछ चलने दिया है। किसी को 0.1 फीसदी बढ़ा दिया तो किसी का 0.1 फीसदी चुरा लिया। बस, हो गई टीआरपी। केवल दो बिंदु उल्लेखनीय है।
'इंडिया टीवी' को घटाने के बाद इस हफ्ते पूरे 2.2 अंक बढ़ाकर फिर से 'आजतक' के करीब ला दिया है। आजतक को 0.6 फीसदी गिरा दिया है ताकि आजतक और इंडिया टीवी में ढिशुम-ढिशुम का सुख जनता ले सके। दूसरा उल्लेखनीय बिंदु है डीडी न्यूज को तेज के पीछे कर देना। आखिर टैम वाले कब तक सरकारी दबाव में काम करेंगे। इस बार डीडी न्यूज को तेज के पीछ कर दिया है। 'समय' न्यूज चैनल 'न्यूज 24' से बढ़त बनाए हुए है। 'समय' कम गिरा है, न्यूज 24 ज्यादा धड़ाम हुआ है। इंडिया न्यूज के बेहद बुरे दिन शुरू हो गए हैं। इसकी टीआरपी अब एक प्वाइंट से भी नीचे जा चुकी है। हां, एक बात तो बताना भूल ही गए। आपने नोटिस किया है कि पिछले कई हफ्तों से आईबीएन वाले न घट रहे हैं न बढ़ रहे हैं। बिलकुल यथावत हैं। चलिए, कोई तो है जो स्थिर है, जड़ है, चलायमान नहीं है, शाश्वत है। जय हो।
इस हफ्ते की रेटिंग इस प्रकार है--
आज तक- 18.1 (गिरा 0.6), इंडिया टीवी- 17.9 (चढ़ा 2.2), स्टार न्यूज- 14.0 (गिरा 0.9), जी न्यूज- 10.1 (चढ़ा 0.1), एनडीटीवी इंडिया- 9.3 (चढ़ा 0.1), आईबीएन7- 9.0 (यथावत), समय- 6.0 (गिरा 0.1), न्यूज24 - 4.7 (गिरा 0.4), तेज- 4.1 (चढ़ा 0.2), डीडी न्यूज- 3.7 (गिरा 0.4), लाइव इंडिया- 2.1 (गिरा 0.1), इंडिया न्यूज- 0.9 (गिरा 0.1)
Thursday, October 15, 2009
पुण्य प्रसून वाजपेयी का माफीनामा
इशरत जहां के फर्जी मुठभेड़ को सनसनीखेज बनाने के हमारे पेशे के आचरण पर उंगली उठायी गयी थी. एक न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट आने के बाद भड़ास4मीडिया में हमने भी इस मुद्दे पर बहस शुरू की थी. एक लेख में कहा गया था कि सनसनी फैलाने वाले चैनल माफी मांगें. उस वक़्त के सबसे लोकप्रिय चैनल में बड़ी जिम्मेदारी के पद पर काम कर रहे एक बड़े पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि "इशरत, हमें माफ़ कर दो". पत्रकारिता के पेशे में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपनी गलती को ऐलानियाँ स्वीकार कर सकें. बहुत ज़्यादा हिम्मत, बहादुरी और पेशे के प्रति प्रतिबद्धता चाहिए ऐसा करने के लिए. देश के बड़े टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने न केवल माफी माँगी है बल्कि उसे सार्वजनिक कर दिया है.
ध्यान देने की बात यह है कि उनकी माफी को उनकी व्यक्तिगत गलती की माफी मांगने की गलती करने की ज़रूरत नहीं है. वे इशरत जहां मामले के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं है. लेकिन वे पत्रकारिता की गरिमा को समझते हैं. इसलिए हमें उन पर गर्व है. पुण्य प्रसून वाजपेयी का माफीनामा दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हुआ है, जिसे हम वहां से साभार लेकर यहां प्रकाशित कर रहे हैं.
-एडिटर, भड़ास4मीडिया
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इशरत हमें माफ कर दो
पुण्य प्रसून बाजपेयी
15 जून 2004 को सुबह-सुबह जब अहमदाबाद के रिपोर्टर ने टेलीफोन पर ब्रेकिंग न्यूज कहते हुये यह खबर दी कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोएबा में लड़कियां भी जुड़ी हैं और गुजरात पुलिस ने पहली बार लश्कर की ही एक लड़की को एनकांउटर में मार गिराया है, तो मेरे जेहन में तस्वीर यही उभरी कि कोई लड़की हथियारों से लैस किसी आतंकवादी की तर्ज पर किसी मिशन पर निकली होगी और रास्ते में पुलिस आ गयी होगी, जिसके बाद एनकाउंटर। लेकिन अहमदाबाद के उस रिपोर्टर ने तुरंत अगली लकीर खुद ही खींच दी। बॉस, यह एक और फर्जी एनकाउंटर है। लेकिन लड़की। यही तो समझ नहीं आ रहा है कि लड़की को जिस तरह मारा गया है और उसके साथ तीन लड़कों को मारा गया है, जबकि इस एनकाउंटर में कहीं नहीं लगता कि गोलियां दोनों तरफ से चली हैं। लेकिन शहर के ठीक बाहर खुली चौड़ी सड़क पर चारों शव सड़क पर पड़े हैं। एक लड़के की छाती पर बंदूक है। कार का शीशा छलनी है। अंदर सीट पर कुछ कारतूस के खोखे हैं और एक रिवॉल्वर पड़ी है। साथ ही पुलिस कमिश्नर खुद कह रहे हैं कि चारो के ताल्लुकात लश्कर-ए-तोएबा से हैं।
घटना स्थल पर पुलिस कमिशनर कौशिक, क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर पांधे और डीआईजी वंजारा खुद मौजूद हैं, जो लश्कर का कोई बड़ा गेम प्लान बता रहे हैं। ऐसे में एनकाउंटर को लेकर सवाल खड़ा कौन करे? 6 बजे सुबह से लेकर 10 बजे तक यानी चार घंटो के भीतर ही जिस शोर -हंगामे में लश्कर का नया आंतक और निशाने पर मोदी के साथ हर न्यूज चैनल के स्क्रीन पर आतंकवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़नी शुरू हुई, उसमें रिपोर्टर की पहली टिप्पणी फर्जी एनकाउंटर को कहने या इस तथ्य को टटोलने की जहमत करें कौन? यह सवाल खुद मेरे सामने खड़ा था। क्योंकि लड़की के लश्कर केसाथ जुड़े तार को न्यूज चैनलों में जिस तरह भी परोसा जा रहा था, उसमें पहली और आखिरी हकीकत यही थी कि एक सनसनाहट देखने वाले में हो और टीआरपी बढ़ती चली जाए। लेकिन एक खास व्यवस्था में किस तरह हर किसी की जरूरत कमोवेश एक-सी होती चली जाती है, और राज्य की ही अगर उसमें भागीदारी हो जाए तो सच और झूठ के बीच की लकीर कितनी महीन हो जाती है, यह इशरत जहां के एनकाउंटर के बाद कई स्तरों पर बार-बार साबित होती चली गयी।
एनकाउंटर के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पुलिस प्रशासन की पीठ थपथपायी, तब मोदी राज्य व्यवस्था को आतंकवाद के खिलाफ मजबूती प्रदान करने वाले किसी नायक सरीखे दिखे। लड़की के लश्कर के संबंध को लेकर जब मोदी ने एक खास समुदाय को घेरा, तो आंतकवाद के खिलाफ मोदी हिंदुत्व के नायक सरीखे लगे। इस नायकत्व पर उस वक्त किसी भी राजनीतिक दल ने उंगली उठाने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि जो राजनीति उस वक्त उफान पर थी, उसमें पाकिस्तान या कहें सीमा पार आतंकवाद का नाम ऑक्सीजन का काम कर रहा था। यह हथियार सत्ताधारियों के लिए हर मुद्दे को अपने अनुकूल बनाने का ऐसा मंत्र साबित हो रहा था जिस पर कोई अंगुली उठाता, तो वह खुद आतंकवादी करार दिया जा सकता था। कई मानवाधिकार संगठनों को इस फेरहिस्त में एनडीए के दौर में खड़ा किया भी गया। इसका लाभ कौन कैसे उठाता है, इसकी भी होड़ मची। इसी दौर में नागपुर के संघ मुख्यालय को जिस तरह आतंकवादी हमले से बचाया गया, उसने देशभर में आतंकवाद के फैलते जाल पर बहस शुरू की, लेकिन नागपुर में संघ मुख्यालय जिस घनी बस्ती में मौजूद है, उसमें उसी बस्ती यानी महाल के लोगों को भी समझ नहीं आया कि कैसे मिसाइल सरीखे हथियार से लैस होकर कोई उनकी बस्ती में घुस गया और इसकी जानकारी उन्हें सुबह न्यूज चैनल चालू करने पर मिली। इस हमले को भी फर्जी कहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओ का पुलिस ने जीना मुहाल कर दिया। सुरेश खैरनार नामक एक कार्यकर्ता तो दिल्ली में तमाम न्यूज चैनलो में हमले की जांच रिपोर्ट को दिखाने की मन्नत करते हुये घूमता रहा, लेकिन किसी ने संघ हेडक्वार्टर की रिपोर्ट को फर्जी कहने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि शायद इसे दिखाने का मतलब एक अलग लकीर खिंचना होता।
जाहिर है गुजरात हाईकोर्ट ने कुछ दिुनों पहले ही तीन आईएएस अधिकारियों को इस एनकाउंटर का सच जानने की जांच में लगाया है। लेकिन किसी भी घटना के बाद शुरू होने वाली मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट ने ही जिस तरह इशरत जहां के एनकाउंटर को पुलिस मेडल पाने के लिए की गयी हत्या करार दिया है, उसने एक साथ कई सवालों को खड़ा किया है। अगर मजिस्ट्रेट जांच सही है, तो उस दौर में पत्रकारों और मीडिया की भूमिका को किस तरह देखा जाए। खासकर कई रिपोर्ट तो मुबंई के बाहरी क्षेत्र में, जहां इसरत रहती थी, उन इलाको को भी संदेह के घेरे में लाने वाली बनी। उस दौर में मीडिया रिपोर्ट ने ही इशरत की मां और बहन का घर से बाहर निकलना दुश्वार किया। उसको कौन सुधारेगा? सवाल है कि मजिस्ट्रेट जांच के बाद जो विवाद उभरे हैं, उनके बारे में फैसला कब तक होगा? लेकिन इसका इंतजार में हम फिलहाल इतना तो कह ही सकते हैं-इशरत हमें माफ कर दो ।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
ध्यान देने की बात यह है कि उनकी माफी को उनकी व्यक्तिगत गलती की माफी मांगने की गलती करने की ज़रूरत नहीं है. वे इशरत जहां मामले के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं है. लेकिन वे पत्रकारिता की गरिमा को समझते हैं. इसलिए हमें उन पर गर्व है. पुण्य प्रसून वाजपेयी का माफीनामा दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हुआ है, जिसे हम वहां से साभार लेकर यहां प्रकाशित कर रहे हैं.
-एडिटर, भड़ास4मीडिया
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इशरत हमें माफ कर दो
पुण्य प्रसून बाजपेयी
15 जून 2004 को सुबह-सुबह जब अहमदाबाद के रिपोर्टर ने टेलीफोन पर ब्रेकिंग न्यूज कहते हुये यह खबर दी कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोएबा में लड़कियां भी जुड़ी हैं और गुजरात पुलिस ने पहली बार लश्कर की ही एक लड़की को एनकांउटर में मार गिराया है, तो मेरे जेहन में तस्वीर यही उभरी कि कोई लड़की हथियारों से लैस किसी आतंकवादी की तर्ज पर किसी मिशन पर निकली होगी और रास्ते में पुलिस आ गयी होगी, जिसके बाद एनकाउंटर। लेकिन अहमदाबाद के उस रिपोर्टर ने तुरंत अगली लकीर खुद ही खींच दी। बॉस, यह एक और फर्जी एनकाउंटर है। लेकिन लड़की। यही तो समझ नहीं आ रहा है कि लड़की को जिस तरह मारा गया है और उसके साथ तीन लड़कों को मारा गया है, जबकि इस एनकाउंटर में कहीं नहीं लगता कि गोलियां दोनों तरफ से चली हैं। लेकिन शहर के ठीक बाहर खुली चौड़ी सड़क पर चारों शव सड़क पर पड़े हैं। एक लड़के की छाती पर बंदूक है। कार का शीशा छलनी है। अंदर सीट पर कुछ कारतूस के खोखे हैं और एक रिवॉल्वर पड़ी है। साथ ही पुलिस कमिश्नर खुद कह रहे हैं कि चारो के ताल्लुकात लश्कर-ए-तोएबा से हैं।
घटना स्थल पर पुलिस कमिशनर कौशिक, क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर पांधे और डीआईजी वंजारा खुद मौजूद हैं, जो लश्कर का कोई बड़ा गेम प्लान बता रहे हैं। ऐसे में एनकाउंटर को लेकर सवाल खड़ा कौन करे? 6 बजे सुबह से लेकर 10 बजे तक यानी चार घंटो के भीतर ही जिस शोर -हंगामे में लश्कर का नया आंतक और निशाने पर मोदी के साथ हर न्यूज चैनल के स्क्रीन पर आतंकवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़नी शुरू हुई, उसमें रिपोर्टर की पहली टिप्पणी फर्जी एनकाउंटर को कहने या इस तथ्य को टटोलने की जहमत करें कौन? यह सवाल खुद मेरे सामने खड़ा था। क्योंकि लड़की के लश्कर केसाथ जुड़े तार को न्यूज चैनलों में जिस तरह भी परोसा जा रहा था, उसमें पहली और आखिरी हकीकत यही थी कि एक सनसनाहट देखने वाले में हो और टीआरपी बढ़ती चली जाए। लेकिन एक खास व्यवस्था में किस तरह हर किसी की जरूरत कमोवेश एक-सी होती चली जाती है, और राज्य की ही अगर उसमें भागीदारी हो जाए तो सच और झूठ के बीच की लकीर कितनी महीन हो जाती है, यह इशरत जहां के एनकाउंटर के बाद कई स्तरों पर बार-बार साबित होती चली गयी।
एनकाउंटर के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पुलिस प्रशासन की पीठ थपथपायी, तब मोदी राज्य व्यवस्था को आतंकवाद के खिलाफ मजबूती प्रदान करने वाले किसी नायक सरीखे दिखे। लड़की के लश्कर के संबंध को लेकर जब मोदी ने एक खास समुदाय को घेरा, तो आंतकवाद के खिलाफ मोदी हिंदुत्व के नायक सरीखे लगे। इस नायकत्व पर उस वक्त किसी भी राजनीतिक दल ने उंगली उठाने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि जो राजनीति उस वक्त उफान पर थी, उसमें पाकिस्तान या कहें सीमा पार आतंकवाद का नाम ऑक्सीजन का काम कर रहा था। यह हथियार सत्ताधारियों के लिए हर मुद्दे को अपने अनुकूल बनाने का ऐसा मंत्र साबित हो रहा था जिस पर कोई अंगुली उठाता, तो वह खुद आतंकवादी करार दिया जा सकता था। कई मानवाधिकार संगठनों को इस फेरहिस्त में एनडीए के दौर में खड़ा किया भी गया। इसका लाभ कौन कैसे उठाता है, इसकी भी होड़ मची। इसी दौर में नागपुर के संघ मुख्यालय को जिस तरह आतंकवादी हमले से बचाया गया, उसने देशभर में आतंकवाद के फैलते जाल पर बहस शुरू की, लेकिन नागपुर में संघ मुख्यालय जिस घनी बस्ती में मौजूद है, उसमें उसी बस्ती यानी महाल के लोगों को भी समझ नहीं आया कि कैसे मिसाइल सरीखे हथियार से लैस होकर कोई उनकी बस्ती में घुस गया और इसकी जानकारी उन्हें सुबह न्यूज चैनल चालू करने पर मिली। इस हमले को भी फर्जी कहने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओ का पुलिस ने जीना मुहाल कर दिया। सुरेश खैरनार नामक एक कार्यकर्ता तो दिल्ली में तमाम न्यूज चैनलो में हमले की जांच रिपोर्ट को दिखाने की मन्नत करते हुये घूमता रहा, लेकिन किसी ने संघ हेडक्वार्टर की रिपोर्ट को फर्जी कहने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि शायद इसे दिखाने का मतलब एक अलग लकीर खिंचना होता।
जाहिर है गुजरात हाईकोर्ट ने कुछ दिुनों पहले ही तीन आईएएस अधिकारियों को इस एनकाउंटर का सच जानने की जांच में लगाया है। लेकिन किसी भी घटना के बाद शुरू होने वाली मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट ने ही जिस तरह इशरत जहां के एनकाउंटर को पुलिस मेडल पाने के लिए की गयी हत्या करार दिया है, उसने एक साथ कई सवालों को खड़ा किया है। अगर मजिस्ट्रेट जांच सही है, तो उस दौर में पत्रकारों और मीडिया की भूमिका को किस तरह देखा जाए। खासकर कई रिपोर्ट तो मुबंई के बाहरी क्षेत्र में, जहां इसरत रहती थी, उन इलाको को भी संदेह के घेरे में लाने वाली बनी। उस दौर में मीडिया रिपोर्ट ने ही इशरत की मां और बहन का घर से बाहर निकलना दुश्वार किया। उसको कौन सुधारेगा? सवाल है कि मजिस्ट्रेट जांच के बाद जो विवाद उभरे हैं, उनके बारे में फैसला कब तक होगा? लेकिन इसका इंतजार में हम फिलहाल इतना तो कह ही सकते हैं-इशरत हमें माफ कर दो ।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
Thursday, September 24, 2009
न्यूज़ चैनल्स के कंटेंट के विरोध के लिए नफरत भरी कम्युनिटी
शोमा दास की उम्र सिर्फ 25 साल की है। पत्रकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलाफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को देखकर ही शोमा ने पत्रकारिता में आने की सोची। या कहें न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर बनकर कुछ नायाब पत्रकारिता की सोच शोमा ने पाल रखी थी।
बंगाल के आंदोलनो को बेहद करीब से देखने-भोगने वाले परिवार की शोमा को जब बंगला न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो समूचे घर में खुशी थी कि शोमा जो सोचती है वह अब करेगी। बंगला न्यूज चैनल '24 घंटा' की सबसे जूनियर रिपोर्टर शोमा को नौकरी करते वक्त रिपोर्टिग का कोई मौका भी मिलता तो वह रात में कहीं कोई सड़क दुर्घटना या फिर किसी आपराधिक खबर को कवर करने भर का। जूनियर होने की वजह से रात की ड्यूटी लगती और रात को खबर कवर करने से ज्यादा खबर के इंतजार में ही वक्त बीतता। 13 अक्तूबर की रात भी खबर कवर करने के इंतजार में ही शोमा आफिस में बैठी थी। लेकिन अचानक शिफ्ट इंचार्ज ने कहा ममता बनर्जी को देख आओ। बुद्धिजीवियों की एक बैठक में ममता पहुची हैं। शोमा कैमरा टीम के साथ निकल गयी। कवर करने पहुची तो उसे गेट पर ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की हर सभा में गीत गाने वाली डोला सेन ने शोमा दास से कहा '24 घंटा' बुद्धदेव के बाप का चैनल है इसलिये ममता से वह मिल नहीं सकती। लोकिन शोमा को लगा, कोई बाईट मिल जाये तो उसकी पत्रकारिता की भी शुरुआत हो जाये। खासकर बुद्धिजीवियों की बैठक में अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा के लोगों की मौजूदगी से शोमा का उत्साह और बढ़ा, क्योंकि घर में अपनी मां-पिताजी से अक्सर उसने नक्सलबाड़ी के दौर के किस्से सुने थे।
शोभा को ममता में आंदोलन नजर आता। इसलिये उसे लगा कि एक बार ममता दीदी सामने आ जायें तो वह इस मुद्दे पर बाइट तो जरूर ले लेगी। लेकिन गेट पर ममता का इंतजार कर रही शोमा दास का खड़ा रहना भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को इतना बुरा लगा कि पहले धकेला फिर डोला सेन ने ही कहा - 'तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा। भागो यहां से।' लेकिन शोमा को लगा, शायदा ममता बनर्जी को यह सब पता नहीं है, इसलिये वह ममता की बाईट के इंतजार में खड़ी रही और ममता जब निकलीं तो उत्साह में शोमा ने भी अपनी ऑफिस की गाड़ी को ममता के कैनवाय के पीछे चलने को कहा। लेकिन कुछ फर्लांग बाद ही तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने गाड़ी रोकी और शोमा पर ममता की हत्या का आरोप दर्ज कराते हुये उसे पुलिस के हवाले कर दिया। यह सब ममता बनर्जी की जानकारी और केन्द्र में तृणमूल के राज्य-मंत्री मुकुल राय की मौजूदगी में हुआ। शोमा को जब पुलिस ने थाने में बैठा कर पूछताछ में बताया कि ममता बनर्जी का कहना है कि तुम उनकी हत्या करना चाहती थीं तो शोमा के पांव तले जमीन खिसक गयी। उसने तत्काल अपने ऑफिस को इसकी जानकारी थी। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा कैसे सोच भी सकती हैं, यह उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा है।
लेकिन इसका दूसरा अध्याय 14 अक्टूबर को तृणमूल भवन में हुआ। जहां 'आकाश' चैनल की कोमलिका ममता बनर्जी की प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची। कोमलिका मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। लेकिन इस सभा में तृणमूल के निशाने पर कोमलिका आ गयीं। कोमलिका को तृणमूल भवन के बाहरी बरामदे में ही रोक दिया गया। कहा गया 'आकाश' न्यूज चैनल सीपीएम से जुड़ा है, इसलिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने की इजाजत नहीं है। कोमलिका को भी झटका लगा, क्योंकि कोमलिका वही पत्रकार है जिसने नंदीग्राम के दौर में 'समय' न्यूज चैनल में रहते हुये हर उस खबर से दुनिया को वाकिफ कराया था, जब सीपीएम का कैडर नंदीग्राम में नंगा नाच कर रहा था। जब सीपीएम के कैडर ने नंदीग्राम को चारों तरफ से बंद कर दिया था जिससे कोई पत्रकार अंदर ना घुस सके, तब भी कोमलिका और उसकी उस दौर की वरिष्ठ सहयोगी सादिया ने नंदीग्राम में घुस कर बलात्कार पीड़ितों से लेकर हर उस परिवार की कहानी को कैमरे में कैद किया जिसके सामने आने के बाद बंगाल के राज्यपाल ने सीपीएम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। उसी दौर में ममता बनर्जी किसी नायक की भूमिका में थीं।
कोमलिका-सादिया की रिपोर्टिग का ही असर था कि सार्वजनिक मंचों से एक तरफ सीपीएम कहने लगी कि 'समय' न्यूज चैनल जानबूझ कर सीपीएम के खिलाफ काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ ममता दिल्ली आयीं तो इंटरव्यू के लिये वक्त मांगने पर बिना हिचक आधे घंटे तक लाइव शो में ममता मेरे ही साथ यह कह कर बैठीं कि आपकी रिपोर्टर बंगाल में अच्छा काम कर रही है। कोमलिका को लेकर ममता बनर्जी की ममता इतनी ज्यादा थी कि ममता ने कोमलिका को सलवार कमीज तक भेंट की और साल भर पहले जब कोमलिका ने शादी की तो ममता इस बात पर कोमलिका से रुठीं कि उसने शादी में उसे क्यों नहीं आमंत्रित किया।
लेकिन 14 अक्टूबर को इसी कोमलिका को समझ नहीं आया कि वह एक पत्रकार के बतौर अपना काम करने के लिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची है, तो उसे कोई यह कह कर कैसे रोक सकता है कि वह जिस चैनल में काम करती है, वह सीपीएम से प्रभावित है। नंदीग्राम और सिंगूर के आंदोलन के दौर में कोमलिका ने जो भी रिपोर्टिंग की, कभी सीपीएम ने किसी न्यूज चैनल को यह कह नहीं रोका कि आप हमारे खिलाफ हैं, आपको कवर करने नहीं दिया जायेगा। कोमलिका के पिता रितविक घटक के साथ फिल्म बनाने में काम कर चुके हैं और नक्सलबाड़ी के उस दौर को ना सिर्फ बारीकी से महसूस किया है, बल्कि झेला भी जिसके बाद कांग्रेस का पतन बंगाल में हुआ और सीपीएम सत्ता पर काबिज हुई। नंदीग्राम से लालगढ़ तक के दौरान सीपीएम की कार्यशैली को लेकर शोमा दास और कोमलिका के माता-पिता की पीढ़ी में यह बहस गहरायी कि क्या वाकई ममता सीपीएम का विकल्प बनेगी और अक्सर कोमलिका ने कहा - लोगों को सीपीएम से गुस्सा है, इसका लाभ ममता को मिल रहा है।
लेकिन नया सवाल है कि अब ममता से भी गुस्सा है तो किस तानाशाही को शोमा या कोमलिका पंसद करें। यह संकट बंगाल के सामने भी है और पत्रकारों के सामने भी। क्योंकि अगर दोनों नापंसद हैं, तो वैकल्पिक धारा की लीक तलवार की नोंक पर चलने के समान है। तो सवाल है, पत्रकारिता कैसे की जाये?
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लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी मशहूर पत्रकार हैं। इन दिनों वे 'जी न्यूज' में बतौर संपादक कार्यरत हैं। उनसे संपर्क punyaprasun@gmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है। उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है। अगर आप उनके इस लिखे पर कोई कमेंट करना चाहते हैं या दूसरों के कमेंट को पढ़ना चाहते हैं तो क्लिक करें- पुण्य प्रसून का ब्लाग
बंगाल के आंदोलनो को बेहद करीब से देखने-भोगने वाले परिवार की शोमा को जब बंगला न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो समूचे घर में खुशी थी कि शोमा जो सोचती है वह अब करेगी। बंगला न्यूज चैनल '24 घंटा' की सबसे जूनियर रिपोर्टर शोमा को नौकरी करते वक्त रिपोर्टिग का कोई मौका भी मिलता तो वह रात में कहीं कोई सड़क दुर्घटना या फिर किसी आपराधिक खबर को कवर करने भर का। जूनियर होने की वजह से रात की ड्यूटी लगती और रात को खबर कवर करने से ज्यादा खबर के इंतजार में ही वक्त बीतता। 13 अक्तूबर की रात भी खबर कवर करने के इंतजार में ही शोमा आफिस में बैठी थी। लेकिन अचानक शिफ्ट इंचार्ज ने कहा ममता बनर्जी को देख आओ। बुद्धिजीवियों की एक बैठक में ममता पहुची हैं। शोमा कैमरा टीम के साथ निकल गयी। कवर करने पहुची तो उसे गेट पर ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की हर सभा में गीत गाने वाली डोला सेन ने शोमा दास से कहा '24 घंटा' बुद्धदेव के बाप का चैनल है इसलिये ममता से वह मिल नहीं सकती। लोकिन शोमा को लगा, कोई बाईट मिल जाये तो उसकी पत्रकारिता की भी शुरुआत हो जाये। खासकर बुद्धिजीवियों की बैठक में अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा के लोगों की मौजूदगी से शोमा का उत्साह और बढ़ा, क्योंकि घर में अपनी मां-पिताजी से अक्सर उसने नक्सलबाड़ी के दौर के किस्से सुने थे।
शोभा को ममता में आंदोलन नजर आता। इसलिये उसे लगा कि एक बार ममता दीदी सामने आ जायें तो वह इस मुद्दे पर बाइट तो जरूर ले लेगी। लेकिन गेट पर ममता का इंतजार कर रही शोमा दास का खड़ा रहना भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को इतना बुरा लगा कि पहले धकेला फिर डोला सेन ने ही कहा - 'तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा। भागो यहां से।' लेकिन शोमा को लगा, शायदा ममता बनर्जी को यह सब पता नहीं है, इसलिये वह ममता की बाईट के इंतजार में खड़ी रही और ममता जब निकलीं तो उत्साह में शोमा ने भी अपनी ऑफिस की गाड़ी को ममता के कैनवाय के पीछे चलने को कहा। लेकिन कुछ फर्लांग बाद ही तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने गाड़ी रोकी और शोमा पर ममता की हत्या का आरोप दर्ज कराते हुये उसे पुलिस के हवाले कर दिया। यह सब ममता बनर्जी की जानकारी और केन्द्र में तृणमूल के राज्य-मंत्री मुकुल राय की मौजूदगी में हुआ। शोमा को जब पुलिस ने थाने में बैठा कर पूछताछ में बताया कि ममता बनर्जी का कहना है कि तुम उनकी हत्या करना चाहती थीं तो शोमा के पांव तले जमीन खिसक गयी। उसने तत्काल अपने ऑफिस को इसकी जानकारी थी। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा कैसे सोच भी सकती हैं, यह उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा है।
लेकिन इसका दूसरा अध्याय 14 अक्टूबर को तृणमूल भवन में हुआ। जहां 'आकाश' चैनल की कोमलिका ममता बनर्जी की प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची। कोमलिका मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। लेकिन इस सभा में तृणमूल के निशाने पर कोमलिका आ गयीं। कोमलिका को तृणमूल भवन के बाहरी बरामदे में ही रोक दिया गया। कहा गया 'आकाश' न्यूज चैनल सीपीएम से जुड़ा है, इसलिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने की इजाजत नहीं है। कोमलिका को भी झटका लगा, क्योंकि कोमलिका वही पत्रकार है जिसने नंदीग्राम के दौर में 'समय' न्यूज चैनल में रहते हुये हर उस खबर से दुनिया को वाकिफ कराया था, जब सीपीएम का कैडर नंदीग्राम में नंगा नाच कर रहा था। जब सीपीएम के कैडर ने नंदीग्राम को चारों तरफ से बंद कर दिया था जिससे कोई पत्रकार अंदर ना घुस सके, तब भी कोमलिका और उसकी उस दौर की वरिष्ठ सहयोगी सादिया ने नंदीग्राम में घुस कर बलात्कार पीड़ितों से लेकर हर उस परिवार की कहानी को कैमरे में कैद किया जिसके सामने आने के बाद बंगाल के राज्यपाल ने सीपीएम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। उसी दौर में ममता बनर्जी किसी नायक की भूमिका में थीं।
कोमलिका-सादिया की रिपोर्टिग का ही असर था कि सार्वजनिक मंचों से एक तरफ सीपीएम कहने लगी कि 'समय' न्यूज चैनल जानबूझ कर सीपीएम के खिलाफ काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ ममता दिल्ली आयीं तो इंटरव्यू के लिये वक्त मांगने पर बिना हिचक आधे घंटे तक लाइव शो में ममता मेरे ही साथ यह कह कर बैठीं कि आपकी रिपोर्टर बंगाल में अच्छा काम कर रही है। कोमलिका को लेकर ममता बनर्जी की ममता इतनी ज्यादा थी कि ममता ने कोमलिका को सलवार कमीज तक भेंट की और साल भर पहले जब कोमलिका ने शादी की तो ममता इस बात पर कोमलिका से रुठीं कि उसने शादी में उसे क्यों नहीं आमंत्रित किया।
लेकिन 14 अक्टूबर को इसी कोमलिका को समझ नहीं आया कि वह एक पत्रकार के बतौर अपना काम करने के लिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची है, तो उसे कोई यह कह कर कैसे रोक सकता है कि वह जिस चैनल में काम करती है, वह सीपीएम से प्रभावित है। नंदीग्राम और सिंगूर के आंदोलन के दौर में कोमलिका ने जो भी रिपोर्टिंग की, कभी सीपीएम ने किसी न्यूज चैनल को यह कह नहीं रोका कि आप हमारे खिलाफ हैं, आपको कवर करने नहीं दिया जायेगा। कोमलिका के पिता रितविक घटक के साथ फिल्म बनाने में काम कर चुके हैं और नक्सलबाड़ी के उस दौर को ना सिर्फ बारीकी से महसूस किया है, बल्कि झेला भी जिसके बाद कांग्रेस का पतन बंगाल में हुआ और सीपीएम सत्ता पर काबिज हुई। नंदीग्राम से लालगढ़ तक के दौरान सीपीएम की कार्यशैली को लेकर शोमा दास और कोमलिका के माता-पिता की पीढ़ी में यह बहस गहरायी कि क्या वाकई ममता सीपीएम का विकल्प बनेगी और अक्सर कोमलिका ने कहा - लोगों को सीपीएम से गुस्सा है, इसका लाभ ममता को मिल रहा है।
लेकिन नया सवाल है कि अब ममता से भी गुस्सा है तो किस तानाशाही को शोमा या कोमलिका पंसद करें। यह संकट बंगाल के सामने भी है और पत्रकारों के सामने भी। क्योंकि अगर दोनों नापंसद हैं, तो वैकल्पिक धारा की लीक तलवार की नोंक पर चलने के समान है। तो सवाल है, पत्रकारिता कैसे की जाये?
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लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी मशहूर पत्रकार हैं। इन दिनों वे 'जी न्यूज' में बतौर संपादक कार्यरत हैं। उनसे संपर्क punyaprasun@gmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है। उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है। अगर आप उनके इस लिखे पर कोई कमेंट करना चाहते हैं या दूसरों के कमेंट को पढ़ना चाहते हैं तो क्लिक करें- पुण्य प्रसून का ब्लाग
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